जहां कभी सुरक्षा कैंप था, अब वहीं पढ़ रहे आदिवासी बच्चे

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रायपुर, 4 अक्टूबर 2026। अबूझमाड़ के नारायणपुर जिले से बदलाव की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो लोगों का ध्यान खींच रही है। भाटपाल में जिस जगह पर करीब 15 साल तक सुरक्षा बलों का कैंप रहा, आज उसी जगह पर दूर-दराज के आदिवासी गांवों से आने वाले बच्चे रहकर पढ़ाई कर रहे हैं।

 

पुराने सुरक्षा कैंप को अब आदिवासी विद्यार्थियों के छात्रावास में बदल दिया गया है। जहां कभी सुरक्षा बलों की गतिविधियां होती थीं, वहां अब बच्चों की पढ़ाई, किताबें और भविष्य के सपने दिखाई दे रहे हैं।

 

यह पहल दूर गांवों के उन बच्चों के लिए खास है, जिन्हें स्कूल आने के बाद रहने की परेशानी होती थी। छात्रावास मिलने से बच्चों को स्कूल के पास सुरक्षित रहने की जगह मिल गई है।

11 अगस्त से शुरू हुई छात्रावास की सुविधा

 

नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर भाटपाल में लंबे समय तक सुरक्षा कैंप संचालित था। बाद में परिस्थितियां बदलीं तो परिसर को खाली छोड़ने के बजाय प्रशासन ने इसका इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई के लिए करने का फैसला लिया।

 

कलेक्टर श्रीमती नम्रता जैन की पहल पर यहां आदिवासी विद्यार्थियों के लिए छात्रावास शुरू किया गया। 11 अगस्त 2026 से बच्चों के रहने की व्यवस्था शुरू हुई।

 

6वीं से 12वीं तक के बच्चों को मिल रहा फायदा

 

इस परिसर में फिलहाल दो छात्रावास चल रहे हैं।

 

प्री-मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास में कक्षा 6वीं से 10वीं तक के बच्चों के लिए 100 सीटें स्वीकृत हैं। अभी यहां 114 विद्यार्थी रहकर पढ़ाई कर रहे हैं।

 

वहीं पोस्ट-मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास में कक्षा 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों के लिए 50 सीटें स्वीकृत हैं। वर्तमान में यहां 39 विद्यार्थी रह रहे हैं।

 

इससे उन बच्चों को काफी राहत मिली है, जो दसवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए गांव से बाहर आते हैं और रहने के लिए अलग से कमरा या मकान तलाशते थे।

 

स्कूल सिर्फ 50 मीटर दूर

 

छात्रावास की सबसे बड़ी सुविधा यह है कि शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भाटपाल यहां से महज 50 मीटर दूर है।

 

इससे बच्चों को रोज लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती। समय बचने के साथ वे पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दे पा रहे हैं।

 

बच्चों ने बताया- अब पढ़ाई आसान हो गई

 

हलामीमुंजमेटा के कक्षा 9वीं के विद्यार्थी रितेश सोनी ने बताया कि छात्रावास में रहने से उन्हें काफी सुविधा मिल रही है। स्कूल पास है और साथियों के साथ रहकर पढ़ाई करने का अच्छा माहौल मिल रहा है।

 

वहीं राजबेड़ा के कक्षा 12वीं के विद्यार्थी कोमेंद्र करीब 22 किलोमीटर दूर से आते हैं। पहले स्कूल के पास रहने के लिए परिवार को अलग से खर्च करना पड़ता था। अब छात्रावास मिलने से यह परेशानी दूर हो गई है।

 

कलेक्टर ने बच्चों से की बातचीत

 

कलेक्टर श्रीमती नम्रता जैन ने छात्रावास का निरीक्षण कर बच्चों से सीधे बातचीत की। उन्होंने कमरों, भोजन, साफ-सफाई और दूसरी जरूरी सुविधाओं का जायजा लिया।

 

बच्चों ने भी अपनी जरूरतों और समस्याओं के बारे में कलेक्टर को बताया। कलेक्टर ने उनकी जरूरी मांगों पर व्यवस्था करने का भरोसा दिलाया।

 

उन्होंने बच्चों से छात्रावास और कमरों में साफ-सफाई बनाए रखने की अपील भी की।

 

किचन में जाकर देखा बच्चों का खाना

 

निरीक्षण के दौरान कलेक्टर छात्रावास के किचन में भी पहुंचीं। उन्होंने बच्चों के लिए तैयार हो रहे चावल और सब्जी की गुणवत्ता देखी और अधिकारियों को साफ-सफाई का ध्यान रखने के निर्देश दिए।

 

उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों को तय मीनू के अनुसार नाश्ता और भोजन उपलब्ध कराया जाए।

 

सुरक्षा कैंप से छात्रावास तक बदली तस्वीर

 

भाटपाल का यह परिसर अब बदलती तस्वीर का उदाहरण बन गया है। करीब 15 साल तक सुरक्षा बलों का कैंप रहा यह स्थान अब बच्चों की पढ़ाई का केंद्र बन गया है।

 

दूर-दराज के गांवों से आने वाले आदिवासी बच्चों को यहां रहने की जगह, स्कूल के पास सुरक्षित माहौल और पढ़ाई के लिए बेहतर सुविधा मिल रही है।

 

कभी जिस परिसर की पहचान सुरक्षा कैंप के रूप में थी, आज वहीं बच्चों के हाथों में किताबें हैं और उनकी आंखों में आगे बढ़ने के सपने हैं।

 

भाटपाल की यह कहानी बताती है कि किसी जगह का इस्तेमाल समय के साथ कैसे बदल सकता है—सुरक्षा कैंप से छात्रावास तक का यह बदलाव अबूझमाड़ के बच्चों के लिए शिक्षा और बेहतर भविष्य की एक नई राह बना रहा है।

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