
43 इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा से पूवर्ती तक देखा बदलते बस्तर का चेहरा, 21 साल बाद खुले श्रीराम मंदिर के द्वार
रायपुर, 30 सितंबर 2026। बस्तर को लंबे समय तक नक्सल हिंसा, बंदूक और डर के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब इसी बस्तर में बदलाव की तस्वीर भी दिखाई देने लगी है। सुरक्षा के साथ विकास, ग्रामीणों से संवाद और मुख्यधारा में लौट रहे लोगों की कहानियां इस बदलाव को सामने ला रही हैं।
दिल्ली से पहुंचे 43 इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर भ्रमण के दूसरे दिन सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक करीब 13 घंटे से ज्यादा का सफर किया। इस दौरान उन्होंने उन इलाकों को करीब से देखा, जिनका नाम कभी नक्सल हिंसा की खबरों में सुनाई देता था।
पुनर्वास केंद्र में पूर्व नक्सलियों से बातचीत
सुबह सुकमा पहुंचने के बाद इंफ्लुएंसर्स ने पुनर्वास केंद्र का दौरा किया। यहां उन्होंने आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों से बातचीत की।
उन्होंने आत्मसमर्पण के बाद उनके जीवन में आए बदलाव, पुनर्वास और सामान्य जिंदगी में लौटने के अनुभवों को समझा। बातचीत से बस्तर की कहानी का एक मानवीय पक्ष भी सामने आया।
इसके बाद दल ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर क्षेत्र में सुरक्षा, शांति और विकास से जुड़े प्रयासों की जानकारी ली।
साइंस पार्क से लेकर ‘खूनी सड़क’ तक
इंफ्लुएंसर्स ने सुकमा के साइंस पार्क का भी भ्रमण किया। इसके बाद उनका दल तोंगपाल होते हुए जगरगुंडा की ओर रवाना हुआ।
जगरगुंडा जाते समय दल उस सड़क से गुजरा, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ के नाम से जाना जाता है। इसी क्षेत्र का संबंध वर्ष 2010 में हुए ताड़मेटला हमले की स्मृतियों से है। 6 अप्रैल 2010 को हुए हमले में 76 सीआरपीएफ जवानों की जान गई थी।
इंफ्लुएंसर्स ने इस क्षेत्र में पहुंचकर बस्तर के उस कठिन अतीत के बारे में जानकारी ली, जब नक्सली हिंसा यहां की बड़ी चुनौती थी।
21 साल बाद फिर खुले श्रीराम मंदिर के दरवाजे
जगरगुंडा के बाद दल केरलापेंदा पहुंचा। यहां ग्रामीणों से बातचीत के दौरान उन्हें क्षेत्र में हुए बदलावों के बारे में जानकारी मिली।
केरलापेंदा में स्थित श्रीराम मंदिर इस यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव रहा। मंदिर करीब 21 वर्षों तक बंद रहा था। माओवादी प्रभाव के दौर में ग्रामीणों को मंदिर में पूजा-अर्चना नहीं करने का फरमान दिया गया था। डर के कारण लोग मंदिर के आसपास जाने से भी बचते थे।
इसके बाद अप्रैल 2024 में परिस्थितियां बदलीं। सुरक्षा बलों की मौजूदगी और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई की गई। लंबे समय से बंद मंदिर के कपाट दोबारा खुले और भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना फिर शुरू हुई।
जिस मंदिर में वर्षों तक सन्नाटा था, वहां दोबारा पूजा की घंटियां सुनाई देने लगीं और आस्था का दीप जलने लगा।
केरलापेंदा में माओवादी प्रभाव से बाहर आने की कहानी
केरलापेंदा कभी माओवादी प्रभाव वाले क्षेत्रों में शामिल रहा है। वर्ष 2025 में यहां से 9 सहित कुल 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद केरलापेंदा को माओवादी मुक्त गांव घोषित किए जाने की जानकारी इंफ्लुएंसर्स को दी गई।
ग्रामीणों से बातचीत में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि लंबे समय तक संघर्ष से प्रभावित रहे क्षेत्र में सामान्य जीवन की वापसी लोगों के लिए क्या मायने रखती है।
पूवर्ती में हिडमा के परिवार से मुलाकात
इसके बाद दल कई घंटे की यात्रा कर पूवर्ती पहुंचा। पूवर्ती नक्सली कमांडर हिडमा का पैतृक गांव है।
यहां इंफ्लुएंसर्स ने हिडमा के बड़े भाई, भाभी और भतीजे से बातचीत की। उन्होंने गांव की वर्तमान स्थिति, ग्रामीण जीवन और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जानकारी ली।
यह मुलाकात बस्तर की जटिल सामाजिक परिस्थितियों को समझने का एक अलग अनुभव रही। इंफ्लुएंसर्स ने परिवार से केवल अतीत के बारे में ही नहीं, बल्कि गांव की वर्तमान स्थिति और लोगों के जीवन के बारे में भी बातचीत की।
एक ही सफर में दिखा बस्तर का अतीत और वर्तमान
सुकमा के पुनर्वास केंद्र से शुरू हुआ यह सफर जगरगुंडा की शहादत की स्मृतियों, केरलापेंदा के दोबारा खुले मंदिर और पूवर्ती में हुई संवेदनशील बातचीत तक पहुंचा।
इस यात्रा में बस्तर के दो अलग-अलग चेहरे दिखाई दिए। एक तरफ हिंसा और संघर्ष की पुरानी यादें हैं, तो दूसरी तरफ सुरक्षा, विकास, पुनर्वास, ग्रामीण संवाद और सामान्य जीवन की वापसी के उदाहरण भी सामने आ रहे हैं।
केरलापेंदा का श्रीराम मंदिर इस बदलाव की एक खास तस्वीर बनकर सामने आया। जहां कभी डर के कारण पूजा बंद हो गई थी, वहीं अब उसी मंदिर में पूजा-अर्चना और धार्मिक गतिविधियां दोबारा शुरू हो चुकी हैं।
सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा से पूवर्ती तक 43 इंफ्लुएंसर्स की यह यात्रा बस्तर के अतीत और वर्तमान दोनों को करीब से देखने का अनुभव रही। रात करीब 11 बजे दंतेवाड़ा पहुंचने तक उनके सामने बस्तर की कई तस्वीरें थीं—पुनर्वास केंद्र में मिले चेहरे, शहादत से जुड़ी यादें, ग्रामीणों से संवाद, 21 साल बाद फिर खुले मंदिर के कपाट और पूवर्ती में हुई संवेदनशील मुलाकात।
बस्तर की कहानी अब केवल उसके संघर्ष के अतीत तक सीमित नहीं है। इन इलाकों में सामान्य जीवन, संवाद और विकास से जुड़े बदलावों के उदाहरण भी सामने आ रहे हैं।



