
राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की धूम, गढ़ कलेवा के स्टॉल पर चिला-फरा और ठेठरी-खुरमी का स्वाद ले रहे लोग
रेडी-टू-ईट निर्माण से बदली महिलाओं की जिंदगी, सरस्वती स्व-सहायता समूह हर महीने कमा रहा 50 हजार रुपये
रायपुर, 01 नवंबर 2026। छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026 में इन दिनों प्रदेश की संस्कृति, परंपरा और खान-पान का रंग देखने को मिल रहा है। राज्योत्सव में पहुंचे लोग छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद भी ले रहे हैं। इसी बीच रायपुर के घड़ी चौक स्थित गढ़ कलेवा से पहुंचे मनीषा महिला स्व-सहायता समूह का स्टॉल लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
इस स्टॉल पर चिला, फरा, चौसेला, साबूदाना बड़ा, भजिया, ठेठरी और खुरमी जैसे पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन परोसे जा रहे हैं। इन पकवानों का स्वाद लेने के लिए राज्योत्सव में पहुंच रहे नागरिकों की अच्छी रुचि देखने को मिल रही है।
छत्तीसगढ़ी स्वाद के साथ संस्कृति को बढ़ावा
मनीषा महिला स्व-सहायता समूह की महिलाएं अपने हाथों से पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन तैयार कर लोगों को प्रदेश के खान-पान की पहचान से जोड़ रही हैं। चिला और फरा जैसे पारंपरिक पकवान जहां छत्तीसगढ़ी घरों के स्वाद की याद दिलाते हैं, वहीं ठेठरी और खुरमी जैसे व्यंजन प्रदेश की पुरानी खान-पान की परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं।
समूह की महिलाओं का यह प्रयास केवल व्यंजन बेचने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से वे छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खान-पान संस्कृति को नई पहचान भी दिला रही हैं।
अपने हुनर से परिवार को दे रहीं आर्थिक सहारा
मनीषा महिला स्व-सहायता समूह की महिलाएं पारंपरिक व्यंजन तैयार कर अपनी आजीविका चला रही हैं। इस काम से होने वाली आमदनी से वे परिवार के भरण-पोषण में आर्थिक सहयोग कर रही हैं।
महिलाओं का यह प्रयास बताता है कि स्व-सहायता समूहों के माध्यम से पारंपरिक हुनर को रोजगार में बदलकर आत्मनिर्भरता की राह बनाई जा सकती है।
राज्योत्सव बना महिला स्वावलंबन और स्थानीय संस्कृति का मंच
छत्तीसगढ़ राज्योत्सव में ऐसे महिला समूहों की भागीदारी स्थानीय संस्कृति और महिला सशक्तिकरण दोनों को बढ़ावा दे रही है। एक ओर नागरिकों को प्रदेश के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं को अपने हुनर और मेहनत को लोगों तक पहुंचाने का अवसर मिल रहा है।
मनीषा महिला स्व-सहायता समूह की यह पहल दिखाती है कि छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसके पारंपरिक स्वाद, लोक संस्कृति और मेहनतकश महिलाओं में भी बसती है।



