ब्रेकिंग न्यूज़:चंद्रकांत खूंटे,की कविता, मनखे वो दिन मर जाथे

मनखे वो दिन मर जाथे

 

मनखे वो दिन मर जाथे,जब इमान ओखर सर जाथे।

गरीब मन ले काँटा मारथे

लुट-खसोट से घर सारथे

इमानदारी के रद्दा भुला के,

टेबुल तरि रिस्वत ओगारथे।

 

मनखे वो दिन मर जाथे,जब ओखर जुबान सर जाथे।

गुरतुर बोली ल टार दारथे।

करु-कस्सा ल धर डारथे।

पर-अपन के चिन्हारी भुल,

दुक के बीजा बो पारथे।।

 

मनखे वो दिन मर जाथे,जब झगरहा रुप धर दारथे।

हली-भली ल छोड़ के,

मेल-जोल ल तोड़ के,

हरहर-कटकट म पर जाथे

गोठ के गठरी नता बिगारथे।

 

मनखे वो दिन मर जाथे,जब मतवार रूप धर दारथे।

चाल चरित्तर माटी मिला के,

घर-परिवार के ने हिला के,

धमना कस एति-वोति किंदर,

जीवन के सुक गँवा दारथे।।

 

मनखे वो दिन मर जाथे,जब हिंसक रूप धर दारथे।

जी-जंतु से पियार भुलाके,

कमजोरहा मन ल रोवाके।

अपन सुवारथ खातिर वोहर,

सब्ब ला जान से मार दारथे।।

 

मनखे वो दिन मर जाथे,जब जात-धरम ला धर दारथे।

अपन आप ला रोट्ठा समझके,

पर ला तरि अउ छुत समझथे,

किसिम-किसिम के दुक दे देके

सोसन से अपन घर सारथे।।

चन्द्रकांत खुंटे ‘क्रांति’

जांजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़)

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