स्वामी विवेकानंद जी को जयंती पर किए गए याद ,,डॉ अलका यतेंद्र यादव बिलासपुर छत्तीसगढ़

स्वामी विवेकानन्द ‘आयु में कम, किन्तु ज्ञान में असीम थे’। मात्र 39 वर्ष के अपने जीवन काल में स्वामीजी ने विश्वभर के विद्वानों और जन सामान्य के हृदयों में अद्वितीय स्थान प्राप्त किया, यह कोई सामान्य बात नहीं है। स्वामीजी का व्यक्तित्व, उनके विचार और सन्देश ही भारत का जीवन और संदेश है। इसलिए विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) कहते हैं, “यदि आप भारत को समझना चाहते हैं, तो विवेकानन्द का अध्ययन कीजिए, उनमें सब कुछ सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं।”

प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध 1939 का भयंकर परिणाम विश्व के अनेक देशों को झेलना पड़ा। अभी भी अमेरिका, रूस, चीन आदि देशों के शक्ति प्रदर्शन और इस्लामिक देशों में निरन्तर हो रहे हिंसात्मक उथल-पुथल बहुत अधिक चिन्ताजनक

वर्तमान दौर में धर्म का अर्थ बदल गया है। सम्प्रदायों और मजहबों को धर्म कहकर सम्बोधित किया जाता है। अध्यात्म के महत्त्व को सभी स्वीकार भी करते हैं पर अबतक इस भाव को धारण करने के प्रति समाज में भयंकर उदासीनता है। पूजा-पद्धति और कर्मकांड को ही धर्म मान लिया गया। बढ़ती अराजकता, हिंसा, आतंकवाद, नशाखोरी तथा पर्यावरण की हानि आदि समस्याओं के कारण समस्त मानव जाति को अपनी सभ्यता और संस्कृति के समक्ष अस्तित्व का संकट दिखाई दे रहा है।

”त्याग और सेवा” यही भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं। स्वामीजी ने तीन प्रकार की सेवा की बात कही है :- (1) मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना। भोजन, वस्त्र और निवास की व्यवस्था उपलब्ध कराना, प्रथम प्रकार की भौतिक सेवा। (2) अपनी भौतिक आवश्यकताओं की दृष्टि से मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना, दूसरी प्रकार की सेवा है। (3) “मैं कौन हूँ, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?” – इस बात का बोध कराने में सहयोग देना, यह आध्यात्मिक सेवा सर्वोच्च है।

वे कहा करते थे कि मनुष्य निर्माण ही मेरा जीवनोद्देश्य है। यह सच है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी जनता कितनी अच्छी, बुद्धिमान तथा सुयोग्य है। विवेक और समझ के अभाव में सज्जन या दुर्जन, सही या गलत, उचित-अनुचित के मध्य श्रेष्ठ का चयन नहीं किया जा सकता।

स्त्रियों की शिक्षा, स्वतंत्रता और विकास के लिए समूची दुनिया में चर्चा चल रही है। स्त्री चेतना के नाम पर अनगिनत पुस्तकें लिखीं जा रहीं हैं। वहीं दूसरी ओर बाजारवाद, उपभोक्तावाद, स्त्री स्वतंत्रता, करियर और फैशन के नाम पर नारी समाज का एक प्रकार का शोषण ही हो रहा

स्वामीजी भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे और उन्होंने इस दिशा में पूर्ण योजना के साथ कार्य को आगे बढ़ाया। वे मनुष्य के लिए केवल धर्म को ही नहीं, वरन विज्ञान, कला, साहित्य, इतिहास और राजनीति को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे। सभी विषयों पर उनके विचार युगान्तरकारी हैं। स्वामी विवेकानन्द का स्पष्ट मत था कि सम्पूर्ण देशवासियों तक आध्यात्मिक ज्ञान पहुँचे। उन्होंने कहा भी था, “हे भारत, उठो और अपनी आध्यात्मिकता से विश्वविजयी बनो।”

स्वामीजी ने देशवासियों से भारत से प्रेम करने और भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का आह्वान किया। उन्होंने भारतवर्ष को जाग्रत कर उन्हें एकात्मता के सूत्र में जोड़ने का प्रयत्न किया।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षा ही हमारे समस्त दोषों की रामबाण दवा है। किन्तु स्वामीजी के अनुसार शिक्षा केवल कुछ पुस्तकों का पठन-पाठन मात्र न थी। वे कहते थे, “हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है, जिससे चरित्र निर्माण हो, मानसिक शक्ति बढ़े, बुद्धि विकसित हो और देश के युवक अपने पैरों पर खड़े हों।…

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