कांग्रेस के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम जी अपने बयान को वापस ले और राज्य की जनता से माफी मांगे – बसपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत पोयाम।।

रायपुर। 29 जून 2021। बहुजन समाज पार्टी के छ ग प्रदेश अध्यक्ष हेमंत पोयाम ने कांग्रेस पार्टी के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम के उस बयान पर नाराजगी जताई है जिसमें मरकाम ने कहा था कि शराब आदिवासी संस्कृति का अहम हिस्सा है, इसलिए 60 फीसदी अनुसूचित क्षेत्र में शराबबंदी नहीं की जा सकती।ये बयान वो लोग दे रहे हैं जो चुनावों में अपने ही आदिवासी समाज को शराब पिला पिला कर मदहोश कर देते हैं। हमारा आदिवासी समाज मतदान के दिन शराब के नशे में धुत्त रहता है। मतदान केन्द्र में जाकर किसको वोट देना है, इसका भी उसको पता नहीं रहता है। और आदिवासी समाज को इस तरह से शराब के नशे में मदहोश करने का काम यही कांग्रेस और बीजेपी के नेता करते हैं। पिछले चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी का वादा करके पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल करने का काम किया था, और आज जब उसको अपने चुनावी वादे को याद दिलायी जा रही है तो कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष आदिवासियों के संस्कृति की दुहाई देकर अपनी नैतिक जिम्मेदारी से भाग रहे हैं।आदिवासियों की अपनी रूढ़ी प्रथा लाखों, करोड़ों वर्षों से अस्तित्व में है, जिसे भारतीय संविधान में 5 वीं-6वीं अनुसूची के रूप में मान्यता दी गई है। ये सत्य है कि आदिवासी अपनी हर नेंग नीतियों में, पंडुम, कड़साड़, त्योहार में महुए का उपयोग करता है। लेकिन इसका अर्थ ये बिल्कुल भी नहीं है कि आदिवासी समाज के कल्चर में दारू पीना शामिल है। आदिवासी क्षेत्रों में महुए का पेड़ बहुतायत में मिलता है। महुए के पेड़ का हर अंग बहुपयोगी है। छाल, पत्ता, फूल,फल हर चीज मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी है। आदिवासी इसको अच्छे तरीके से जानता है, इसलिए आदिवासी महुए के छाल,फल,फूल,डगाल का उपयोग अपने हर शुभ कार्यों में करता है।
आजादी के पहले तक आदिवासी क्षेत्रों में वो स्थिति नहीं थी, जो हमें आज नजर आता है। आदिवासी कड़ी मेहनत करने वाला इंसान है। जब दिनभर की कड़ी मेहनत से थक,हार कर वो घर पहुँचता था तो अपनी थकान मिटाने के लिए वो फुल्ली मंद (ओरिजिनल महुआ का रस) का एक-दो गिलास का सेवन करता था, जो उसके लिए दवाई का काम करता था, इसी कारण से ही दवा के साथ दारू शब्द का प्रचलन अस्तित्व में आया। किसी को भी अपनी बीमारी का बताईए तो सहज रूप से बात निकलेगी कि दवा-दारू किए कि नहीं?तो निष्कर्ष ये है कि आदिवासी अतीत में दारू का उपयोग दवा के रूप में करता था। परंतु जब से इस देश में आजादी के बाद चुनाव होने शुरु हुए तो बड़े बड़े उद्योगपतियों के चन्दे से संचालित होने वाली राजनीतिक पार्टियाँ कांग्रेस और भाजपा ने आदिवासियों के इसी कमजोरी का फायदा उठाकर उनको दारू की लत लगाकर नशेड़ी बनाने का काम किया। क्योंकि आदिवासी क्षेत्रों की जमीन के नीचे स्थित खनिज संसाधनों पर बड़े उद्योगपतियों को कब्जा करना था और अगर आदिवासी पढ़ लिखकर जागरुक होगा तो वो पूंजीपतियों के इस काले मंसूबों को कामयाब होने नहीं देता, इसलिए कांग्रेस, बीजेपी की सरकारों ने बड़ी चालाकी से षड्यंत्र करके आदिवासियों को नशे के चंगुल में फंसाया और बड़े बड़े नकली शराब के ठेकेदारों को अनुसूचित क्षेत्र में शराब के ठेकेदारी को दिलवाया और आदिवासियों को उनके ओरिजिनल महुए का रस(फुल्ली मंद) को छुड़वाकर नकली केमिकल से निर्मित नकली शराब का बड़े पैमाने पर आदी बनाने का काम किया और नकली शराब के ठेकेदार अनुसूचित क्षेत्र में व्यापार करके करोड़पति-अरबपति बनकर शानो-शौकत की जिन्दगी जी रहे हैं। और आज सरकार अपने उन्ही नकली शराब के ठेकेदारों से उनका ठेका बंद कराना छोड़कर आदिवासियों को बदनाम करने पर तुली हुई है।आदिवासी समाज अपनी इस बेइज्जती को नहीं सहेगा।कांग्रेस सरकार आदिवासी क्षेत्रों से नकली केमिकल युक्त शराब की बिक्री पूर्णतः प्रतिबंधित करे। और शराबखोरी के नाम पर आदिवासियों को बदनाम करना बंद करे।
बहुजन समाज पार्टी छत्तीसगढ़ इकाई कांग्रेस पार्टी के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष श्री मोहन मरकाम जी के इस बयान की कड़ी निन्दा करती है, और ये मांग करती है कि अपना ये आदिवासी विरोधी बयान वापस ले, और आदिवासी समाज से माफी मांगे।

Global36 गढ़ के संवाददाता नीलकांत खटकर।।

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